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Monday, 10 April 2017

मैं भी कट्टर हूँ और मेरा दोस्त अखिलेश भी....! I am also dogmatic and my friend Akhilesh too....!

By Dr. IM  |  07:29 No comments

मैं भी कट्टर हूँ और मेरा दोस्त अखिलेश भी....! I am also dogmatic and my friend Akhilesh too....!

जितना मैं कट्टर हूँ, उतना ही मेरा दोस्त अखिलेश भी कट्टर है।
अगर मैं खुद को कट्टर मुस्लिम कहता हूँ तो उसे भी कट्टर हिन्दू कहलाना पसंद है।
और हम वो सब काम करते है,जो एक कट्टर हिन्दू या मुसलमान को करना चाहिए,हमारी दोस्ती में कभी कट्टरता रूकावट नही बनी,बल्कि इस कट्टरता ने तो दोस्ती को मज़बूत ही किया है।
  • मैं कट्टर मुसलमान इसलिए हूँ कि इस्लाम पर सख्ती से चलता हूँ,उसकी हर बात मानता हूँ।
  • अखिलेश भी इसलिए कट्टर है कि वो हिन्दू तौर-तरीकों पर अमल करता है।

मेरा इस्लाम मुझसे कह रहा है किसी से नफरत मत करो और किसी के खुदा को बुरा भी मत कहो...इतना ही नही वो तो ये भी कह रहा है पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक किये बिना तुम मुसलमान नही हो सकते,फिर चाहे वो हिन्दू,सिख,ईसाई या यहूदी ही क्यों न हो 
और 
अखिलेश का मज़हब कह रहा है ईशवर एक है और कोई मज़हब बुरा नही।सारे इंसान एक ही ईशवर की औलाद है।रस्ते अलग हैं पर मंज़िल एक है।
हम दोनो चूंकि कट्टर है और अपने मज़हब की बात पर कट्टरता से अमल करते है,इसलिए कभी एक दूसरे से नफरत करने का ख़याल ही नही आया।
एक दूसरे से अगर नफरत करने लगेंगे तो फिर मज़हब से खारिज हो जायगे,क्योंकि ऐसा करने की इजाज़त न तो उसका मज़हब दे रहा है,न मेरा और हां, जो नफरत फैला रहे है,एक दूसरे को लड़ा रहे है,अपनी राय दूसरो पर थोप रहे है,कई सेनाएं बनाकर दीवारे खड़ी कर रहे है,मेहरबानी करके उन्हें कट्टर हिन्दू या मुसलमान न कहे,वो मक्कार है,अय्यार है,नफरत के ताजिर है,जो मज़हब में नफरत पिरो कर घूमते है।
कट्टर तो मैं और अखिलेश है,जो अपने मज़हब के लिए जान दे सकते है,पर नफरत का एक थप्पड़ किसी को नही मार सकते।

अपने मज़हब पर मज़बूती से चलने के बावजूद कहीं भी अखिलेश वजह से मुझे कोई दिक्कत नही आई और यही हाल उसका भी है।
कई बार मैंने मंदिर के बाहर उसका इंतज़ार किया है 
और वो मस्जिद की दिवार से लग कर खड़ा रहा है।
मैंने कभी उसे मस्जिद में नही बुलाया और न ही उसने मुझे मंदिर में आने की दावत दी,क्योंकि उसे पता है मैं मूरत के आगे सर नही झुकता और न मैने कभी उसके सामने गोश्त रखा,क्योंकि उसे देख भी नही सकता है।
उसने कभी मुझे प्रसाद नही खिलाया,पर मैंने कोई शिकायत भी नही की,वजह मज़हब अपना अपना है।उसमे कोई दखल नही है और न वो दोस्ती में दखल दे रहा है।

हमारे एक ही उसूल है,जब हमारे मज़हब नफरत और लड़ने-झगड़ने की इज़ाज़त नही दे रहे है ,तो फिर क्यों लड़े।
हैरत तो ये है क़ि जो मज़हब मिलकर रहना सिखाते है,उन्ही के नाम पर लड़ा जा रहा है।लड़ा वो रहे है,जो मज़हब को जानते ही नही,अगर जानते तो लड़ने का सोच भी नही सकते है।

इतना समझ लीजिए जब हम दो कट्टर मज़हबी साथ रह सकते है,एक दूसरे के घर आ जा सकते है,खाना खा सकते है और दुःख-सुख का हिस्सा बन सकते है,तो फिर कम से कम मज़हबी कट्टरवाद को तो नफरत की वजह न बताई जाए।।

इसके पीछे मज़हब नही सियासत है,जो कुर्सी के लिए लड़ा रही है और सब जान बूझ कर लड़ भी रहे है।
पर आप लड़िए मैं और अखिलेश तो कट्टर मज़हबी है,नही लड़ेंगे।
इसके बाद मैंने अखिलेश को साइकल पर बिठाया और दोनों निकल पड़े।
I am also dogmatic and my friend Akhilesh too....!

As much as I am hardcore, my friend Akhilesh is also dogmatic. If I call myself a fanatic Muslim, he also likes a fanatic Hindu. And we do all work, which should have a fanatic Hindu or Muslim, in our friendship, in our friendship, but this dogma has made the friendship strong. I am an orthodox Muslim because of the strictly Islam, he believes in every thing. Akhilesh is also dogmatic that he works in Hindu ways. My Islam is telling me don't hate someone and don't say bad to someone else... so it is not that you can't be Muslims without doing well, he will not be Muslims, then he will be Hindu. And why do not happen to the Sikh, Christian or Jewish, and the religion of Akhilesh is one and no religion is not bad. The human being is a son of God. There is a destination on the way. Since we both are hardcore and act against their religion, so never came to hate each other. If you would hate to hate one another, then it is not allowed to do so, because it is not allowed to do it, nor is my opinion. It is an, by making many armies, by making many armies, by mercy, he is a hypocrite, Ayyār, Ayyār, the hate, the hatred is ayyār. Dogmatic, I can't kill someone who can give a slap for their religion, but a slap of hate.
There is no problem in his religion, despite his Akhilesh. Many times I have waited out of the temple and he is standing by the wall of the mosque. I have never called him in the mosque nor he gave me the feast to come in the temple, because he does not have to be able to look forward to him, and I have never seen him, because he can't see him. He never fed me, but I have no complaints, because of my own. There is no meddling in it, nor is he interfering in friendship.
We have the same time, when our religion is not giving permission to fight and fight, then why fight. So that is the mankind of those who are going to live in the name of those who are going to live. The fight is he who does not know, even if you know, but can't even think of fighting. So when we can live with two hardcore religious religious, can be able to eat, eat food and may be a part of sorrow, then at least religious Orthodoxy. Go. .
There is no religion behind it, who is fighting for the chair and fighting all. I don't fight against you and Akhilesh. After this, the hi roberts him and both left.



Author: Dr. IM

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